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पसमांदा समाज की हुंकार: “हिस्सेदारी नहीं तो समर्थन नहीं”
राजनीतिक दलों को चेतावनी, यूपी-बिहार चुनाव में भागीदारी के बिना समर्थन नहीं
लखनऊ: राजधानी Lucknow में सोमवार को पसमांदा मुस्लिम समाज (pasmanda muslim society) से जुड़े विभिन्न संगठनों और धर्मगुरुओं का एक बड़ा जमावड़ा देखने को मिला। इस सम्मेलन में पसमांदा समाज ने अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर खुलकर आवाज उठाई और स्पष्ट रूप से चेताया कि यदि राजनीतिक दलों ने उन्हें उनका वाजिब प्रतिनिधित्व नहीं दिया तो आगामी उत्तर प्रदेश और बिहार विधानसभा चुनावों में उनका समर्थन नहीं मिलेगा।
सम्मेलन में मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष और वरिष्ठ धर्मगुरु मौलाना शहाबुद्दीन रज़वी ने हिस्सा लिया और मंच से पसमांदा समाज को खुला समर्थन दिया। उन्होंने कहा, “अब पसमांदा समाज सिर्फ वोट बैंक नहीं, बल्कि नेतृत्व चाहता है।” उन्होंने यह भी कहा कि लंबे समय से पसमांदा मुसलमानों को सियासी लाभ से वंचित रखा गया है, जबकि उनकी आबादी काफी बड़ी है।
पसमांदा मुस्लिम समाज के सक्रिय प्रतिनिधि वसीम राईन ने कहा कि, “हम सिर्फ भाषण नहीं, अब सत्ता में सीधी भागीदारी चाहते हैं। यह हमारा हक है और इसके लिए हम सड़कों से संसद तक लड़ाई लड़ेंगे।” सम्मेलन में यह भी ऐलान किया गया कि आने वाले दिनों में पूरे देश में पसमांदा समाज को लेकर एक बड़ा अभियान चलाया जाएगा, जिसमें उनकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं को लेकर जागरूकता फैलाई जाएगी। इस मंच पर कई मुस्लिम सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि एकत्र हुए और समाज की एकता का संदेश दिया।
सम्मेलन का उद्देश्य साफ था—पसमांदा समाज को राजनीतिक दलों की प्राथमिकता में लाना और उनके लिए आरक्षण, शिक्षा, रोजगार और नेतृत्व के स्तर पर ठोस नीतियां सुनिश्चित कराना। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह सम्मेलन आने वाले चुनावों में एक नया समीकरण तैयार कर सकता है, खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार में, जहां पसमांदा समाज की संख्या निर्णायक मानी जाती है।

